पॉक्सो के तहत बच्चों को गलत नीयत से छूना भी अपराध सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया स्पष्ट

पॉक्सो के तहत बच्चों को गलत नीयत से छूना भी अपराध सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया स्पष्ट

उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि बच्चों को गलत नीयत से छूना भी पॉक्सो कानून के तहत अपराध है। यौन हमले का सबसे महत्वपूर्ण कारक यौन मंशा है, न कि बच्चों की त्वचा से त्वचा का संपर्क। शीर्ष अदालत ने इसी के साथ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत दायर एक मामले में बंबई उच्च न्यायालय के ‘त्वचा से त्वचा के संपर्क’ संबंधी विवादित फैसले को खारिज कर दिया।
बच्चों को गलत नीयत से छूना

बंबई उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि यदि आरोपी और पीड़ित के बीच ‘त्वचा से त्वचा का सीधा संपर्क’ नहीं हुआ है तो पॉक्सो कानून के तहत यौन उत्पीड़न का कोई अपराध नहीं बनता है। न्यायमूर्ति यूयू ललित, न्यायमूर्ति रवींद्र भट और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि कानून का मकसद अपराधी को कानून के चंगुल से बचने की अनुमति देना नहीं हो सकता। यौन अंग को छूना या यौन इरादे से किया गया शारीरिक संपर्क का कोई भी अन्य कृत्य पॉक्सो कानून की धारा-7 की व्याख्या के तहत यौन उत्पीड़न के दायरे में आएगा।

पीठ ने कहा, हमने कहा है कि जब विधायिका ने स्पष्ट इरादा व्यक्त किया है तो अदालतें प्रावधान में अस्पष्टता पैदा नहीं कर सकतीं। न्यायमूर्ति भट ने इससे सहमति रखते हुए एक पृथक फैसला सुनाया। पीठ ने कहा, यौन उत्पीड़न के अपराध का सबसे महत्वपूर्ण कारक यौन इरादा है, बच्चे की त्वचा से त्वचा का संपर्क नहीं। किसी नियम को बनाने के बाद वह नियम प्रभावी होना चाहिए, न कि नष्ट। प्रावधान के उद्देश्य को नष्ट करने वाली उसकी कोई भी संकीर्ण व्याख्या स्वीकार्य नहीं हो सकती। कानून के मकसद को तब तक प्रभावी नहीं बनाया जा सकता, जब तक उसकी व्यापक व्याख्या न हो।

अटॉर्नी जनरल ने पहली बार आपराधिक पक्ष पर दायर की याचिका
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पहली बार है, जब अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने आपराधिक पक्ष पर कोई याचिका दाखिल की है। वेणुगोपाल ने याचिका में कहा था कि बंबई हाईकोर्ट का विवादास्पद फैसला एक खतरनाक और अपमानजनक मिसाल पेश करेगा। इसे पलटने की जरूरत है।

इस बार भाई-बहन एक-दूसरे के खिलाफ खड़े
मामले में न्याय मित्र के रूप में अपराधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए, जबकि उनकी बहन वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा ने राष्ट्रीय महिला आयोग का प्रतिनिधित्व किया। इस पर सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस बार एक भाई-बहन भी एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं।

क्या है मामला
अटॉर्नी जनरल और महिला आयोग की ओर से दायर अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने बंबई हाईकोर्ट के आदेश पर 27 जनवरी को रोक लगा दी थी। बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने अपने आदेश में पॉक्सो कानून के तहत एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा था कि त्वचा से त्वचा के संपर्क के बिना नाबालिग के वक्ष को पकड़ने के कृत्य को यौन हमला नहीं कहा जा सकता।

हाईकोर्ट का फैसला
नागपुर पीठ की न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने अपने फैसले में कहा था कि त्वचा से त्वचा के सीधे संपर्क के बिना नाबालिग के वक्ष को छूना पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन अपराध नहीं माना जा सकता। व्यक्ति ने कपड़े हटाए बिना बच्ची को पकड़ा, इसलिए इसे यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-354 के तहत एक महिला की गरिमा भंग करने का अपराध है।

निचली अदालत का आदेश पलटा था
उच्च न्यायालय ने एक सत्र अदालत के आदेश में संशोधन किया था। सत्र अदालत ने 12 वर्षीय बच्ची का यौन उत्पीड़न करने के अपराध में 39 वर्षीय व्यक्ति को पॉक्सो कानून और आईपीसी की धारा-354 के तहत तीन-तीन साल कैद की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष ने कहा था कि बच्ची के साथ यह घटना नागपुर में दिसंबर 2016 में हुई थी, जब आरोपी सतीश उसे कुछ खिलाने के बहाने अपने घर ले गया था।

पॉक्सो कानून के तहत अपराध से बरी किया
यौन उत्पीड़न मामले में दोषी को सत्र अदालत की तरफ से पॉक्सो कानून और आईपीसी के तहत सुनाई गई दोनों सजा साथ-साथ चलनी थी। हालांकि, बंबई उच्च न्यायालय ने उसे पॉक्सो कानून के तहत अपराध से बरी कर दिया था। वहीं, आईपीसी की धारा-354 के तहत सुनाई गई सजा बरकरार रखी थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यौन हमले की परिभाषा में शारीरिक संपर्क प्रत्यक्ष रूप से होना चाहिए।

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